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🍦समाज में नारी की भूमिका 🍦 (भाग -दो )

🍦नारी का स्वरूप :-- नारी जगत जननी होते हुए जल
                             स्वरूपा है अर्थात जैसा माहौल वैसा इसका स्वरूप होजाता है ।यह अत्यंत परिवर्तन शील प्राणी है ।जब शिशु रूप मे होती है तब माता-पिता, भाई-बहन की परछाई मात्र रहती है, ससुराल में पति, सास-ससुर और जेठ -जेठानी की छाया बनकर रहती है ।जिस प्रकार जल का अपना कोई रंग नहीं होता, जो रंग मिला दो  वही जल का रंग हो जाता है ।अर्थात नारी एक महानता की मिसाल होती है ।नारी पूज्यनीय होती है ।अपने लिए दुखोंकाभंडारऔरदूसरो के लिए सुख का खजाना होती है ।नारी का विधवा रूप किसी के हृदय को झंझोर सकता  है। इस अंक में नारी के वैधवय रूप
का वर्णन करेंगे ।

    🍦वह घड़ी नारी के जीवन की सबसे दुखद घड़ी होती है जब उसका शौहर उससे सदा के लिए अलग होता है ।अर्थात पति की मृत्यु के पश्चात वह अपने आप को निरीह समझने लगती है और उसे अपने पति का आचरण रहरह कर याद आता है ।ऐसे मे विधवा नारी को अपने पति के आचरण के अनुकूल कार्य करने चाहिए ।अर्थात जिस तरह पति की जीवित अवस्था में उसके मन के अनुकूल आचरण करती थी, उसी प्रकार उसके मरने पर भी करना चाहिए ।धर्म का ऐसा आचरण करने वाली स्त्री पति के मरने पर भी साध्वी कहलाती है और वह उत्तम गति को प्राप्त होती है ।वह पवित्र पुष्प, मूल और फलों द्वारा अपने शरीर का निर्वाह करती हुई  पवित्रता के साथ अपना जीवन बितावें ।परपुरूष के दर्शन, भाषण, चिन्तन की बात तो दूर रही, उसका नाम भी उच्चारण न  करं।

   🍦कामंतु क्षपयेदेह पुष्पमूलफलैःशुभै।
        न तु नामापि गृहीयात पतयौ प्रते परसय तु।।
       आसीतामरणातक्षा नियता ब्रह्मचारिणी ।
     यो धर्म एक पत्नीनां काङक्षनती तमनुततमम
                                             (मनु05/157-158)

     🍦🔧पवित्र पुष्प, मूल  फलोके  द्वारा निर्वाह करते हुए अपनी देह को दुर्बल भले ही कर दे, परन्तु पति के मरने पर दूसरे का नाम भी न ले ।पतिव्रता स्त्रियों के सर्वोत्तम धर्म को चाहने वाली विधवा नारी मरणपर्यनत क्षमा युक्त नियमपूर्वक ब्रह्मचर्य से रहे।
        🍦इस प्रकार ब्रह्मचर्य का पालन करती हुई विधवा स्त्री साध्वी पतिव्रता स्त्री के अनुसार पति के उत्तम लोकों को प्राप्त होती है ।केवल फल, मूलादि से काम न चले तो साधारण शाक अन्न द्वारा एक बार भोजन करके जीवन धारण करे।
यदि ऐसा करके न रहा जाये तो दोनो समय हल्का और अल्पाहार कर ले ;किन्तु मादक और अपवित्र एवं कामोत्तेजक पदार्थों का सेवन न करे तथा घी,दूध, चीनी, मसाला आदि का सेवन न करे; क्योंकि ये सब उत्तेजक है ।कर्तव्य समझकर निष्काम भाव से पालन किया हुआ धर्म परम गति को प्राप्त कराता है।

    🍦नेहाभिक्रमनाशोऽसित प्रत्यवायो न विदयते।
       स्वल्पमपयसय धर्मसय त्रायते महतो भयात् ।।
                                                     गीता  2/40
      🍦इस निष्काम कर्मयोग में आरम्भ का अर्थात बीज का नाश नही है और उल्टा फलस्वरूप दोष भी नहीं है, इसलिए इस निष्काम कर्मयोग रूप धर्म का थोडा भी साधन जन्म -मृत्यु रूप महान भय से उद्धार कर देता है ।अतःविधवा स्त्रियों को निष्काम भाव से पतिव्रता स्त्रियों की भांति पति के मरने के बाद में भी पति को जिस कार्य मे संतोषहोता है, वही कार्य करके अपना काल व्यतीत करना चाहिए ।वर्तमान समय मे कोई भाई,जिनको शास्त्र का अनुभवनहीं है, विधवा स्त्रियों को बहला-फुसलाकर उनका दूसरा विवाह करवा देते है,किन्तु शास्त्रों मे कहीं विधवा -विवाह की विधि नही है मनु जी कहते हैं--
       नो द्वाहिकेषु मंत्रेषु नियोगः कीर्तयते कवचित्।
       न     विवाह विधावुकतम्  विधवावेदनम् पुनः।।
                                                     (9/65)
    (नारी सदैव से सम्मान की पात्रा होते हुए भी उपेक्षित रही है; अतएव हम सभी संकल्प लें कि भविष्य मे न तो अपमानित हो और न कभी उपेक्षित हो।)

                                        एकता झा
                                                समाज सेविका

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