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पुरुषों का महिलाओं के व्यवहार कैसा हो?

पुरूष एवं स्त्री:-जहां महिलाओं यानि
माता बहिनों में अवगुण देखने को मिलते हैं ।वहीँ पुरुषों का  पर्यवेक्षण
करने पर पता चला कि पुरुषों में महिलाओं के अपेक्षा अधिक दोष नज़र आये। चूँकिइस अध्याय में हमकेवल
स्त्रियों के विषय मे चर्चा करेंगें।
      🌺   अपेक्षा कृत देखा जाए तो सभी स्त्रियां पुरुषों के साथ मैं सेवावाद व्यवहार करती हैं । पर बदले में पुरुषों के साथ वैसा नहीं करते कोई कोई तो बात बात में अपनी स्त्रियों का अपमान करते हैं उनको गालियां देते हैं और मारपीट तक भी करने लग जाते हैं, यह मनुष्यता की बाहर की बात है ।उन भाइयों से हमारा नम्र निवेदन है कि स्त्रियों के साथ अमानवीय व्यवहार कदापि न करें।  इस प्रकार के व्यवहार से इस लोक में अपकीर्ति और परलोक में दुर्गति होती है ।कोई -कोई भाई लोभ के वशीभूत होकर अपनी कन्या को अंगविहीन, मूर्ख ,अति बृद्ध,चरित्रहीन अपात्रों, को कन्या सौंप देते हैं ।  वह देने और लेने वाले दोनों कन्या के जीवन को नष्ट करते हैं । और स्वयं नरक के भागी होते हैं अतः ऐसे पापों से मनुष्य को अवश्य बच कर रहना चाहिए।

   🌺  स्त्रियों के साथ सत्कार पूर्वक अच्छा व्यवहार करना चाहिए। स्त्रियों का जहां सत्कार होता है ,वहां सब देवता निवास करते हैं। "यत्र नारी पूज्यते,  तत्र देवता रम्यते"।   और जहां सतकार नहीं होता है वहां सारे कर्म निष्फल होते हैं ।जब घर में कोई पुरुष बीमार पड़ता है ।उसके लिए जितनी कोशिश होती है ,उतनी कम है। लेकिन जब कोई स्त्री बीमार पड़ती है तब नहीं होती है ।यह विषमता का व्यवहार विष के समान फल देने वाला है ।अतः पुरुषों को उचित है कि स्त्री  व पुरुष सब के साथ समता का व्यापार करें।

    🌺 स्त्रियों में जो कई प्रकार दोष है उनका कारण भी अधिकांश पुरुष ही हैं ;क्योंकि पुरुष स्त्रियों के साथ बुरा व्यवहार करते हैं ।अतः उनको पुरुषों से बुरी शिक्षा प्राप्त होती है ।  यदि पुरुष  स्त्रियों के   साथ  अपना व्यवहार सुधारे तो उनका    बहुत  सुधार     होना स्वाभाविक है ।  क्योंकि यह न्याय है कि जब कोई किसी के साथ अच्छा व्यवहार करता है ।तो दूसरा भी उसके साथ अच्छा ही व्यवहार करता है।

    🌺 विधवा स्त्रियों के साथ तो पुरुषों का व्यवहार प्रायः निंदनीय भी है ।उसके सुधार की बहुत ही आवश्यकता है ।     जिसका पति मर जाता है ।  वह बेचारी अनाथ होजाती है ।उसका लोग कहीं  आदर  नहीं  करते न पीहर में  न ससुराल में ।  बहुत से पुरुष अपनी पत्नियों के वश में होकर धर्म पाल ने वाली सुशीला विधवा स्त्री के साथ में नम्रतापूर्वक व्यवहार नहीं कर पाते ,ना उनका पालन पोषण ही करते । प्रथम तो इस घोर कलिकाल में विधवा का धर्म रहना स्वाभाविक ही कठिन है ।उस पर कोई रखना चाहती है । तो उसको मदद देना तो दूर रहा ।बल्कि लोग अनेक प्रकार के संकटों में डालने की चेष्टा करते हैं ।इसमें कोई कोई तो दुखित होकर धर्म को छोड़ देती है । अतः जिनके घर में विधवा स्त्री हो उन मनुष्यों को स्वयं संयम से रह कर  उनको संयम की शिक्षा देनी चाहिए। ऐश आराम लोगों को तुच्छ समझकर स्वयं उत्तम आचरण को करते हुए उनको क्रिया के द्वारा सीख देनी चाहिए । उनकी तन मन धन से मदद करनी चाहिए । विशेष मदद ना दे सके तो उनके स्वत्व पर तो बुरी नियति कभी नहीं करनी चाहिए । बहुत से लोग तो ऐसे देखे गए हैं । जो पुत्र भाई आदि के मरने के बाद उनकी स्त्रियों के धन पर अधिकार जमा कर उन पर झूँठा सच्चा कलंक लगा कर ,उनको भोजन तक भी नहीं देते ।और कोई कोई तो लोभ में आकर धन छीनने के लिए निकालने तक की चेष्टा करते हैं । दुखिया की हाय से उनका यह लोक और परलोक नष्ट हो जाता है ।उन पुरुषों को ईश्वर की तरफ और मृत्यु की तरफ ख्याल करके इस राक्षसी कर्म से विरत होना चाहिए। यह लेख स्त्रियों के विषय का होने के कारण पुरुषों के विषय को यहां विशेष नहीं लेकर संक्षेप से ही कुछ निवेदन मात्र किया है।


                          🌺   एकता झा
                                     समाज सेविका🌺

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