Skip to main content

🐅अश्वगन्धा,औषधीय पौधा🐅 Ashwagandha, a Medicinal Plant🐅

🎋अश्वगन्धा :--- एक औषधीय वानस्पतिक पौधा     

        है। यह अत्यधिक शक्तिवर्धक होने के कारण इसका नामकरण अश्व के नाम से जोड़ा गया है ।सब मर्जों की एक दबा में प्रयुक्त होने वाला दबा  एवं पोषक तत्व है ।इसके सेवन से शरीर में समुचित ऊर्जा का संचार होता है ।और व्यक्ति स्वस्थ  और चुस्त-दुरुस्त बना रहता ।बृदध अवस्था मे भी वह अपने आप को कार्य करने मे सक्षम महसूस करता है ।

    💈वानस्पतिक नाम :--विदेनिया सानमीफेरा, इसका Botanical Name है।
    💈प्रचलित नाम :-- इसे असगंध एवं बाराहरकर्णी, बाजिगंधा,बहमनेवर्री के नाम से भिन्न -भिन्न क्षेत्रों में पाया जाता है।
    💈प्राप्ति स्थान :-- भारत के पश्चिमोत्तर भाग तथा हिमालय में 5000 फीट की ऊंचाई तक पाया जाता है।
    💈पौधे की ऊंचाई :-- झाड़ी दार क्षुप लगभग दो से चार फीट ऊंचा बहु शाखा युक्त तथा सदाहरित,नदी-नालों एव॔ बडे-बडे वृक्षों के पास देखे जाते हैं।
    💈अन्य प्रजाति :--असगंध दो प्रकार के होते है   छोटी तथा बड़ी ।छोटी असगंध का क्षुप छोटा परन्तु मूल बड़ा होता है ।
    💈रोपण विधि:-- शरद ऋतु मे फूल आते है तथा कार्तिक के अंत मे पकता है ।वर्षा ऋतु मे इसके बीज बोये जाते हैं।खेतों मेंलगाने सेपहले इसे नर्सरी मे लगाना चाहिए ।आधा -आधा मीटर की दूरी पर खेतो में फैला देते है । सिंचाई तथा खाद की अधिक आवश्यकता नही पड़ती है ।अधिक वर्षा हानिकारक है।
    💈प्रयोग अवधि  :--एक वर्ष तक इसकी  मोटी-मोटी जड़ों का प्रयोग कर सकते हैं ।
    💈उपयोग विधि :--अश्व गंधा एक बलवर्धक रसायन है ।सभी प्रकार के जीर्ण रोग, क्षय रोग, शरीर मे धातुओं की बृदधी, मांस-मज्जाका शोधन, मेधावर्धक,तनाव शामक है। मूर्छा, भ्रम, अनिद्रा, रक्त चाप  (उच्च ),श्वांस रोग, शुक्र दौर्बलय,कुष्ठ रोग में समान रूप से लाभकारी ।सूखा रोग हेतु यह एक ग्रामीण चिर प्रचलित औषधि है ।यह निद्रा लाने तथा शुक्राणुओं की बृदधी कर कामोत्तेजक भूमिका निभाता है, परन्तु इसका शरीर पर अवांछनीय प्रभाव नही होता है ।महिलाऑ को प्रसवोपरानत देने पर बल प्रदान करता है ।अश्व गंधा एक प्रकार का हिमेटीनिक  (रकत लोहा बढ़ानेवाला)टानिक है।अर्थात यह सर्वे गुण सम्पन्न औषधि है ।
 
                   
                                                   B L JHA
                                                            Advocate

Comments

Post a Comment

Popular posts from this blog

🐦समाज में नारी की भूमिका 🐦

🐦विवाहित नारी :--नारी समाज की धुरी है यदि यह अस्त
                  व्यस्त है तो समाज का का कोई औचित्य ही नही है ।बिना इसके मनुष्य अधूरा है तो समाज भी अधूरा के साथ साथ अस्तित्वहीन है ।जब जब नारी की उपेक्षा की गई है तब -तब अवसाद उत्पन्न हुआ है ।भारत मेंनारी की पूजा व सम्मान होता आया है इसलिए कहा गया है -यत्र नारी पूजयते,तत्र देवता रमयते।इसी संदर्भ मेंइस अध्याय में नारी की जीवन चर्या से सम्बंधित कुछ गुण-दोष वर्णन किया गया है कि-
    🐦नारी के कर्तव्य :-विवाहित नारी के लिए पतिव्रत धर्म के समान कुछ भी नही है इसलिए मनसा बाचा कर्मणा पति के सेवापरायण होना चाहिए ।नारी के लिए पतिपरायणता ही मुख्य धर्म है ।इसके अलावा सब धर्म गौण है ।महर्षि मनु ने साफ लिखा है कि स्त्री के लिए पति की आज्ञा के बिना यज्ञ तप, व्रत, उपवास आदि कुछ भी न करने चाहिए ।स्त्री केवल पति की सेवा सुश्रूषा से उत्तम गति पाती है तथा स्वर्ग लोक मे देवता गण भी उसकी महिमा का बखान करते हुए उसकी प्रशंसा करते हैं।जो स्त्री पति की आज्ञा के बिना यज्ञ, तप, व्रत, उपवास आदि करती है, वे अपने पति की आयु का क्षरण करती है तथा स्वयं नर्क  में ज…

पुरुषों का महिलाओं के व्यवहार कैसा हो?

पुरूष एवं स्त्री:-जहां महिलाओं यानि
माता बहिनों में अवगुण देखने को मिलते हैं ।वहीँ पुरुषों का  पर्यवेक्षण
करने पर पता चला कि पुरुषों में महिलाओं के अपेक्षा अधिक दोष नज़र आये। चूँकिइस अध्याय में हमकेवल
स्त्रियों के विषय मे चर्चा करेंगें।
      🌺   अपेक्षा कृत देखा जाए तो सभी स्त्रियां पुरुषों के साथ मैं सेवावाद व्यवहार करती हैं । पर बदले में पुरुषों के साथ वैसा नहीं करते कोई कोई तो बात बात में अपनी स्त्रियों का अपमान करते हैं उनको गालियां देते हैं और मारपीट तक भी करने लग जाते हैं, यह मनुष्यता की बाहर की बात है ।उन भाइयों से हमारा नम्र निवेदन है कि स्त्रियों के साथ अमानवीय व्यवहार कदापि न करें।  इस प्रकार के व्यवहार से इस लोक में अपकीर्ति और परलोक में दुर्गति होती है ।कोई -कोई भाई लोभ के वशीभूत होकर अपनी कन्या को अंगविहीन, मूर्ख ,अति बृद्ध,चरित्रहीन अपात्रों, को कन्या सौंप देते हैं ।  वह देने और लेने वाले दोनों कन्या के जीवन को नष्ट करते हैं । और स्वयं नरक के भागी होते हैं अतः ऐसे पापों से मनुष्य को अवश्य बच कर रहना चाहिए।

   🌺  स्त्रियों के साथ सत्कार पूर्वक अच्छा व्यवहार करना चाहिए। स्त्…

🍦समाज में नारी की भूमिका 🍦 (भाग -दो )

🍦नारी का स्वरूप :-- नारी जगत जननी होते हुए जल
                             स्वरूपा है अर्थात जैसा माहौल वैसा इसका स्वरूप होजाता है ।यह अत्यंत परिवर्तन शील प्राणी है ।जब शिशु रूप मे होती है तब माता-पिता, भाई-बहन की परछाई मात्र रहती है, ससुराल में पति, सास-ससुर और जेठ -जेठानी की छाया बनकर रहती है ।जिस प्रकार जल का अपना कोई रंग नहीं होता, जो रंग मिला दो  वही जल का रंग हो जाता है ।अर्थात नारी एक महानता की मिसाल होती है ।नारी पूज्यनीय होती है ।अपने लिए दुखोंकाभंडारऔरदूसरो के लिए सुख का खजाना होती है ।नारी का विधवा रूप किसी के हृदय को झंझोर सकता  है। इस अंक में नारी के वैधवय रूप
का वर्णन करेंगे ।

    🍦वह घड़ी नारी के जीवन की सबसे दुखद घड़ी होती है जब उसका शौहर उससे सदा के लिए अलग होता है ।अर्थात पति की मृत्यु के पश्चात वह अपने आप को निरीह समझने लगती है और उसे अपने पति का आचरण रहरह कर याद आता है ।ऐसे मे विधवा नारी को अपने पति के आचरण के अनुकूल कार्य करने चाहिए ।अर्थात जिस तरह पति की जीवित अवस्था में उसके मन के अनुकूल आचरण करती थी, उसी प्रकार उसके मरने पर भी करना चाहिए ।धर्म का ऐसा आचरण करने…